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गाजा पर ‘मजलूमों’ पर का कहर
सलीम अख्तर सिद्दीकी एडोल्फ हिटलर 1933 में र्जमनी की सत्ता में आया था। उसने यहूदियों को इंसानी नस्ल का हिस्सा नहीं माना। 1939 में र्जमनी द्वारा दूसरा विश्व युद्ध भड़काने के बाद हिटलर ने यहूदियों को जड़ से मिटाने के लिए अंतिम हल यानी ह्यफा ... [read more]
पहली बार : भावना मिश्रा की कविताओं पर के रवींद्र के पोस्टर
पहली बार : भावना मिश्रा की कविताओं पर के रवींद्र के पोस्टर [read more]
मानवता के स्वप्न अब तक अधूरे है
मानवता के स्वप्न अब तक अधूरे है [read more]
गौर करो,सुनो-समझो,फिर कहो
जो मिलते ही बड़ी बड़ी बातें करते हैं कुछ कर गुजरने की  वे रेत की दीवारों की तरह गिर जाते हैं  उनके होने के निशाँ भी नहीं मिलते   …  …तो गौर करो,सुनो-समझो,फिर कहो  [read more]
डायन से ड्राक्युला हुई महंगाई
सलीम अख्तर सिद्दीकी बहुत दिनों बाद बाजार गया था। बाजार में महंगाई इठलाती इतराती घूम रही थी। वह पहले से ज्यादा मोटी हो गई थी। चेहरे पर पहले से ज्यादा चमक थी। गरूर तो जैसे उसमें कूट-कूट कर भरा पड़ा था। उसने मुझ पर तंज भरी नजरें डालीं। ... [read more]
गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में)-गुरु से सीखा गुरु से जाना
गुरु से सीखा गुरु से जाना गुरु ने समझाया गुरु ने बताया ज्ञान रखने से नहीं बांटने से बढ़ता है सार्थक ज्ञान ही जीवन आधार है ज्ञान का दुरूपयोग अक्षम्य अपराध है जो बांटा नहीं वह अज्ञान है उपयोग नहीं किया तो अत्याचार है ज्ञान का ... [read more]
परिकल्पना बनने जा रहा है विश्व ब्लॉगिंग का एक बड़ा प्लेटफॉर्म ?
चौंकिए मत, यह सच है कि आपकी  'परिकल्पना'  एक भारतीय गैर लाभ धर्मार्थ संगठन का स्वरूप धारण करने जा रही है, जो अपने साथ विश्व के कई भाषाओं के ब्लॉगर और विद्वानों की एक सशक्त टीम बनाकर मुफ्त लाइसेंस या सार्वजनिक कार्यक्रम (public domain) क ... [read more]
कार्यशाला-३५ शहर में बरसात
शहर में बरसात आ गई है, और इस बरसात से खुश-हैरान-परेशान जन अपनी अपनी जीवन गाथा को अलग अलग तरह से व्यक्त करने लग गए हैं। अपने शहर की बरसात को रेखांकित करने का यह विशेष अवसर है जब सभी रचनाकार इस कार्यशाला में अपने उस विशेष शहर की बरसात को ... [read more]
बस आपके लिए
परिकल्पना उत्सव समाप्त हुआ है - परिकल्पना का प्रवाह नहीं  परिकल्पना एक निर्बाध  कुछ अल्हड़  कुछ सशक्त  कुछ बिंदास  कुछ गहन-गंभीर  धूप-छाँव सी नदी है  और मैं मछुआरिन :)  भावनाओं की मछलियाँ मुझसे बच नहीं सकतीं  तो एक बड़ी टोकरी परि ... [read more]
परिकल्पना ब्लॉग उत्सव इसबार मॉरीशस.....
परिकल्पना केवल एक सामुदायिक ब्लॉग नहीं, बल्कि हिन्दी के माध्यम से एक सुंदर और खुशहाल सह- अस्तित्व की परिकल्पना को मूर्तरूप देने की कोशिश है। [read more]
chhand salila: durmila chhand -sanjiv
ॐ छंद सलिला: दुर्मिला छंद    संजीव * छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-१४, पदांत  गुरु गुरु, चौकल में लघु गुरु लघु (पयोधर या जगण) वर्जित। [read more]
२५. याद मुझे फिर कनहल आया
तपती देख धरा की काया। याद मुझे फिर कनहल आया। [read more]
२४. फूल कनेर के
किसने रोके पाँव अचानक धीरे-धीरे टेर के। उजले-पीले भर आए आँगन में फूल कनेर के। [read more]
ब्लॉगोत्सव-२०१४, परिकल्पना समय की अब तक कुछ ख़ास झलकियाँ (समापन)
समय  .... यह समय जो हमेशा हमारे साथ होता है इसी ने बनाया था परिकल्पना का मंच  साक्षी बन बहुत कुछ कहता गया   हिंदी - हिंदी ब्लॉग्स की पहचान को उभारता गया  इसकी नींव के पत्थर रवीन्द्र प्रभात ने जोड़े थे      आज उस समय की अब तक की कुछ ... [read more]
ब्लॉगोत्सव-२०१४, कहने को ,सुनाने को और था, लेकिन .... ३ (समापन)
पूरी हुई परिक्रमा  … अब बारी है कुछ अपनी कह सुनाने की  नहीं कहना मैंने नहीं सीखा  हाँ, कहने से पहले सोचती हूँ  कुछ वक़्त को वक़्त देती हूँ  कुछ अपने आप को ! किसी का दिल दुखे - मैं चाहती नहीं  पर न दुखाओ तो कुछ भी कह जाते हैं  तो कल ... [read more]
ब्लॉगोत्सव-२०१४, कहने को ,सुनाने को और था, लेकिन .... २ (समापन)
कितनी बातें जो तेरे शहर की थीं  हाँ मेरे गाँव से थोड़ा अलग  …  उनको जोड़कर  तोड़कर  कहना तो था अभी और   लेकिन फिर कभी ! अभी तो यही कहना है इस मंच से - एक सपने सा ही लगता है निकल पाऊँगी  इस जंगल में शब्दों के घने साये हैँ   [read more]
ब्लॉगोत्सव-२०१४, कहने को ,सुनाने को और था, लेकिन .... १ (समापन)
दो बुलबुले आँखों के मुहाने से बादलों की तरह ख़्वाबों की दुनिया बनाते हैं .... ये ख़्वाबों की दुनिया कितनी अच्छी लगती है ! न कहीं जाना ना कोई खर्च सबकुछ पास उतर आता है बादल , पहाड़, चाँद , सितारे आकाश, पाताल , धरती , नदी बस ख्व ... [read more]
२३. घंटियाँ कनेर पर
बैठ गयी बौराई पुरवाई पेड़ पर। हिलने लगीं स्वर्णमयी घंटियाँ कनेर पर। [read more]
२२. हम कनेर हो पाते
सुख में, ग़म में हर मौसम में सिर्फ फूल महकाते काश कहीं ऐसा हो पाता हम कनेर हो पाते [read more]
२१. कनेर
ढूह झहरता, रह-रह चींटी चपल उग्र है ताप पड़ा है.. ! सुलग उठे हैं धूल-बगूले किन्तु अड़ा है सौम्य कनेर.. ! [read more]
ब्लॉगोत्सव-२०१४ का एतिहासिक समापन कार्यक्रम....
ब्लॉगोत्सव-२०१४ का   एतिहासिक समापन कार्यक्रम   दिनांक:05.07.2014  [read more]
२०. रंगों का उपहार कनेर
रंगहीन होते मौसम में रंगों का उपहार कनेर [read more]
१९. धूप की कलसी
हरित डाल में पीला झूमर ना सूरज ना पछुआ का डर धूप रंग कलसी में भरता सोने जैसा फूल कनेर। [read more]
१८. नन्हा कनहल
खिला बाग़ में, नन्हा कनहल प्यारा लगने लगा महीना रोज बदलते है मौसम, फिर धूप-छाँव का परदा झीना। [read more]
१७. ये कनेर के फूल
इनसे मिलकर अब भी बीते पल हम जीते हैं ये कनेर के फूल तुम्हारी बातें करते हैं [read more]
१६. खिलता हुआ कनेर
बहुधा मुझ से बातें करता खिलता हुआ कनेर, अभ्यागत बनने वाले हैं शुभ दिन देर सवेर। [read more]
ब्लॉगोत्सव-२०१४, अट्ठाइसवाँ दिन, मैं' … ???
मैं रहती हूँ अपने 'मैं' के साथ  क्योंकि अक्सर  [read more]
ब्लॉगोत्सव-२०१४, अट्ठाइसवाँ दिन, आज इस रंगमंच पर - चलो तुमको लेकर चलें ....
नई पीढ़ी भी पुराने गानों में बँधती हैँ, और तब उनकी पसंद के आगे सोचना होते है क़ि अभी पिक्चर बाकी है  .... ठीक उसी तरह एक बार आराम से ब्लॉग के पुराने पोस्ट पढ़िए तो बहुत अच्छा लगता है, और न पढ़ा हो तो उसे पढ़ने का आनंद मिलता है  . कुछ पोस्ट प ... [read more]
ब्लॉगोत्सव-२०१४, अट्ठाइसवाँ दिन, कुछ पन्ने ज़िन्दगी के
ज़िन्दगी और भीड़  शोर और भागती ज़िन्दगी  मौत की चाह  जीने के लिए अपने अपने ख्याल  प्यार,पैसा,पूजा,एकांत  ....  आओ कुछ पन्नों से रूबरू हों  .... रश्मि प्रभा  [read more]
१५. डाल डाल पर
डाल-डाल पर कनहल की, बूँद-बूँद बदली झलकी। [read more]